रेखाबहू ..जरा एक गिलास पानी तो देना जरा…बाहर से आते ही मालती चाचीने साडी के पल्लू से अपना पसीना पोछते हुए अपने बहू क़ो आवाज लगाई.. अरे ..बहू सुना नहीं क्या? पानी …
हां..हां ..सूना ये लो पानी..रेखा पानी का गिलास लाकर धडाम से सास के सामने रख कर बोली कुछ और तो नहीं चाहिए तुम्हे ..
नहीं कुछ नहीं .. मालती चाची को अनसुना करके रेखा खाना पकाने के लिये अंदर रसोई घर मे चली गयी..
ये क्या हो गया बहूको ?दो- तीन दिनसे मेरे साथ ये कैसा अजीब सा बर्ताव कर रही हैं .. मुझसे ठीक से बात भी नही कर रही..
मालती चाची सोचमे पड गयी ..
ऐसी क्या गलती हो गयी की …
मुझसे मेरा बेटा सुनील भी ठीक से बात नहीं कर रहा है क्या हो गया उन दोनो को ॽ उनकी आखे नम हो गई. .
दा..दी दादी इतनी गुमसुम क्यो होॽक्या हो गया है आपकोॽ
कुछ भी तो नहीं बेटा फिर रो क्यो रही होॽ
बबलू ने अपनी दादी के गोदी मे बैठकर उनसे पूछा..
आँखो मे कचरा चला गया था बेटा आसू पोछते हुए दादी बोली.. उसी वक्त सुनील भी दफ्तर से घर आया उसे देखकर मालती चाची ने पूछा..
आ गये बेटा..बेटा सुनो ना ..
बहोत थक गया हूं मां ..मुझे आराम करने दो.
इतना सा जवाब देकर सूनील अपने कमरेमे चला गया..
बबलू चलो खाना खाने ..
रेखा ने बबलू को अंदर से ही आवाज दी और सुनील को बोली..तुम भी जल्दी हाथ-पैर धो लो खाना तयार है, चलो तबतक मैं परोसती हूं। दादी..चलो ना खाना खाने ..
बबलू दादी का हाथ पकड़ कर बोला ना बेटा मुझे भूख नहीं है।
फिर मैं भी नहीं खाऊंगा बबलू जिद पर अड गया.
चल अंदर ज़िद मत कर सुनीलने बबलू को डांटते हुए कहा।
पर..दा…दी ..दादी…
जब देखो तब दादी.. दादी चल अंदर खाना खाने बैठ।
रेखा ने अपनी सास को दिवानखाने में ही खाना परोसा और अंदर जाकर सुनील , बबलू के साथ खाना खाने बैठ गई ..
मालती चाची अकेले ही उदास मन से खाना खाने लगी.
कितना बदल गया है ..मेरा सुनील अपनी मां से बात करने के लिए भी उसके पास वक़्त नहीं है और रेखा बहू उसको मैंने सदा अपनी सगी बेटी की तरह ही प्यार दिया ..उनके सिवा मेरा है ही कौन इस दुनिया में… इतना सा था सुनील जब उसके पिताजी गुज़र गये थे… उनके जाने के बाद कितनी तकलीफ से मैने उसे पाल-पोस कर बडा किया ये एक छोटेसे मकान के सिवा क्या था मेरे पास जो मिला जैसे मिला उसीसे गुजारा किया मेरे जीने का एक ही मकसद था मेरा सुनील..
.सोचते ..सोचते मालती चाची की आंख कब लग गई उनको पता भी नही चला। सबेरे सबेरे उनकी आंख खुलते ही बेटे और बहू की खुसूर फुसूर उनकी कान में पड़ी रेखा बहू बोल रही थी..
देखो जी मैने तय कर लिया आज से इस घर मे ये..रहेगी नही तो मै ..सोचो एक बार..
.सुनील बोला, हा..हा तुम चिंता मत करो रेखा मैने मां का कही और
इंतजाम कर दिया है.. मै आज उनको वहां भेज दूंगा ..
हा ..हा भेज दो इतना बोलकर रेखाने कपडो से भरी हुयी एक पोटली लाकर सुनील के हाथो मे धमा दी.. सुनील बोला,.
चलो मा ..अब तुम यहा नही रहोगी… फिर कहा रहूंगी मै बेटा.. मेरा तुम्हारे सिवा कौन है इस दुनिया में ..
.वह मै कुछ नही जानता चलो यहा से.. चलो बेटा मेरा क्या मै कहीं भी रह लूंगी..कहकर उदासीनतासे उसके साथ चल पड़ी ..मां ने भी अपने आपको अकेले रहने के लिये मना लिया था.. चलते..चलते..थोडीही देरमे.. उसने देखा की..
सुनील ने अपने आपको एक आलीशान बंगले के सामने लाकर खड़ा किया ..वो देखती रह गई और बोली …
बेटा ये क्या हैं? दरवाजे पर उसका ही नाम लिखा हुवा था..
…मालती सदन..
मालती चाची दंग रह गयी..
रेखा बहु की पिछे से आवाज आयी..
ये ..अपना नया घर है मांजी..आजसे हम ..सब यही रहेंगे ..
क्या? लेकिन !
मालती चाची आश्चर्यचकित होकर बोली,
हां ..मांजी आप वो पुराना घर छोड़ने को तयार नही थी..और आपको वो छोटसे घरमे अपना खुद का कमरा भी नहीं था इसलिये पुरा दिन आपको दिवाणखाने मे ही रहना पडता था ..कितनी तकलीफ होती थी..फिर भी कुछ नही कहती थी.. यही सोचकर हमने आपको बडे मकान मे लाने के लिए ये झूठ..मुठ का नाटक रचा..
हमे माफ कर दो मांजी…हम आपको छोड कर कहा जायेंगे..
सुनील ने अपनी मां के हातो मे नये मकान की चाबी देकर ताला खोलने के लिये कहा.. और साथ ही मे सबने मिलकर मालती चाची को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई दी… मालती चाची को ऐसा लग रहा था मानो अपने बेटे..बहु के हातोसे मकान की नहीं ..उनके खुशियोकी चाबी मिल गयी उनकी आंखे छलक उठी.,.
खुशी के मारे वो फुले नही समा रही थी. .
… दर्शना भुरे जैन…

बढिया
खुशिया निकालकर चाबी खो जाये
बहोत खूब
मस्तच
Khupch chan
Khupch chan Wahh