जुस्तजू जिसकी की उसको-song review
जुस्तजू जिसकी की उसको-song review

जुस्तजू जिसकी की उसको-song review

1981 में आई उमरावजान  सालो बाद भी लोगोकी यादमें,दिमागमें,मनमें बसी है।उमरावजान का नाम लेतेही सामने आ जाते है उसके गीत,छोटी अमरीन और उमरावजानमें जान डालनेवाली रेखा।
लखनौकी तवायफ उमरावजान को मद्देनजर रखते मिर्जा हादी रुस्वाने किताब लिखी उस किताबपर ये फिल्म बनी है।
उमराव जान सचमें  हूई थी या  महज काल्पनिक पात्र है इसपर भी बहोत बहस छेडी थी।
फिल्ममें अबोध,मासूम अमरीनका अपहरण होता है ,कोठेपर लाये जाने के बाद अमरीनकी दुनिया, जीवन बदल जाती है।
मानो उसका बचपन खत्म हो जाता है।
मासूम अमरीन से कोठे पें नाचनेवाली बहूतोकी जान बनने तकका सफर दिग्दर्शक मुजफ्फर अलीने दिखाया है।
अमरीन उमरावजान बननेके बाद उसके लिए खुदके घरके दरवाजे बंद हो जाते है। शादी,घर सब सपनेही रह जाते है। सबको मिलनेवाली ये बाते उससे बहुत दूर चली जाती है।चाह कर भी वो अब उसे हासिल नही कर सकती।
उसको मोहब्बत तो मिलती है पर आधी अधूरी ।
बिछडा हूआ बचपन, अधूरी  मोहब्बत, सामने अस्थिर जिंदगी, पिछे मुडनेका रास्ता बंद।
सभी भाव,भावनाएँ रेखाने बहुत ताकदसे दिखाई है।
उमरवजानकी आंतरिक भावनाएँ  सही शब्दोमें व्यक्त करनेवाले गीत, गजल,
उसको चार चाँद लगानेवाला खय्यामजीका संगीत।
भावनाओकों आवाजका साज देकर गाने में उतारनेवाली आशा भोसलेजी, उमरावके साथ उसी ताकदसे अभिनय करनेवाले अभिनेता—–सभी मिलकर इस फिल्मकों एक ऊँचाई पर ले गये।
फिल्ममें सभीका योगदान है फिरभी उमरावजान का नाम लेतेही बहुत लोगोके सामने सिर्फ और सिर्फ रेखाही आती है।
इसका कारण है उसकी लाजवाब  अदाकारी, उसकी सुंदरता,उसका नृत्य और अमीर होते हुए भी आसुओसे भरी हूई  उसकी आँखे।
उसके दिलका दर्द  उसके आँखोंसे हम तक पहूँच जाता  है।
जुस्तजू जिसकी की उसको तो ना…..
ये गजल लिखी है शायर शहरयारजीने।
आशा भोसलेको इस गजलके लिए राष्ट्रीय  पुरस्कार  मिला।
नवाबको (फारुक शेख) उमरावजानसे मुहब्बत होती है।
लेकिन  तवायफके साथ रिश्ता उनकी माँ को नापसंद है।
माँ कि खातिर नवाब उमरावजानको छोड देता है।
उमरावजान अकेलेपन का दर्द नवाबाके हवेलीमें उसके और उसकी बेगमके सामने इस गजलमें बताती है।
जुस्तजू जिसकी की उसको तो ना….
जो चाहिए था,जिसकी चाह थी,जो जिंदगीभर ढूँढती रही वो मिला नही लेकिन उस बहानेसे लोगोकी असलीपहचान हो गयी। उनके नकलीचेहरेके पिछेका असली चेहरा दिखने मिला।
तुम्हें नाराज या बदनाम नही किया।
कुछ शिकायतभी नही कि, किसी बातका पछतावा नही।बस् इश्ककी रस्म निभाती गयी। तुमसे मुहब्बत करती रही।
तुमने दिलमें दस्तक दी कब?कब हम बिछडे कुछ याद नही।तुम जिंदगी में थे वही जिंदगी थी।
तुम गये और जिंदगी जिंदगी न रही।
अब तो वो भी  ख्वाँब लगता है।
पूरी जिंदगी तन्हाईमें गुजार दी अब उसपे बात करनेमेभी  क्या रखा है?
जुस्तजू जिसकी थी उसको तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने
 तुझको रुसवा न किया, खुद भी पशेमाँ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने
जुस्तजू जिसकी थी…
कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी, हमें याद नहीं
ज़िंदगी तुझको तो, बस ख़्वाब में देखा हमने
जुस्तजू जिसकी थी…
ऐ अदा और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तन्हा हमने
जुस्तजू जिसकी थी…
गजल खत्म हो जाती है।
उदासीका आलम  खत्म होनेमें लम्हें लगते है।
सुननेवालोको होशमें आनेके लिए वक्त लगता है।
गजल गाते समय उमरावका दुख ,दर्द,नवाबकी मजबूरी
रेखा और फारुख अपनेतक पहूँचाते है।
उमरावजानके चेहरेकी मुस्कुराहटके पीछे का दर्द और उसकी आँखोमें छिपे हुए  आँसू सब रेखाकी अदाकारीकी जादू दिखाते है।
उमरावजान कहतेही सामने रेखा क्यों  आती है इसका जवाब भी मिलता है।
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