आइना मनका
आइना मनका

आइना मनका

आजकल आइने में देखनेसे घबराती है वो।
चेहरेपर झुर्रीयाॕ देखती है तो उसके दिलकी धडकने बढ जाती है।
सफेद बाल दिखा तो उसको छुपानेकी की कोशिशे शुरु होती है।
भौहें में एकभी ज्यादा बाल दिखा तो ब्युटिशियनकी याद आ जाती है।
मै बुढी हो रही हूँ…..
इस एहसास से डर सी जाती है वो।
सोचते सोचते थकीहारी सी वो बिस्तर पर लेट जाती है।
और तभी उसको एहसास होने लगता है अंदरसे
कुछ याद आने लगता है उसे
अरे, मै क्यों इस आइनेके भरोसे बैठी हूँ।
मेरे मनका आइना –
वो तो मै भूलही गयी हूँ
सिर्फ उसमें ही तो मेरा असली चेहरा दिखेगा।
और वो मनका आइना टटोलने लगती है।
उसमें दिखती है वो वैसीही नटखट,
यौवनसे भरपूर,
फुलोकी बौछार देखके खूश होनेवाली।
बच्चोको देखकर खूदके बचपन को याद करनेवाली,
रातरानी के सुगंध से महकनेवाली,
पक्षियों की किलकिलाहट सुनकर चहकनेवाली,
गाने सुनते समय गानेमे,उसके शब्दोमें डूब जानेवाली,
श्याम को सबकी अधीर मनसे राह देखनेवाली
वही अधीरता,
जीनेकी वही उमंग,
वही जिंदा दिल
इन सबमें कहाँ है बुढापा?
मतलब ये बाहरका आइना झूठ बता रहा है,धोखा दे रहा है
अब वो बाहर
के आइने की परवाह नही करेगी।
उसका असली प्रतिबिंब तो उसके अंदरका,मनका आइना ही दिखाएगा।
हाँ ये बात सही है कि अब ये प्रतिबिंब थोडा अधिक मॕच्युअर, अनुभवसे भरापुरा बन गया
लेकिन उसका यौवन नष्ट हो रहा…..ये कतई सच नही है।
आज बहोत दिनोकें बाद मुस्कुराहट खिली उसके चेहरेपर।
आज वो खुदसे मिली।
बाहर का कौनसा भी आइना अब उसका यौवन,उसकी मुस्कुराहट, उसकी जिंदादिली नही छिन सकता।
हर किसीके पास ऐसा एक आइना होना चाहिए.
होता भी है
लेकिन हम ही उसमें देखनेसे कतराते है।

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