परसों अभय और विभा की तिसवीं शादी की सालगिरह मनाई गई ।
उनके के दोनों बच्चोनें समय निकालकर प्लान बनाया ।
अभय और विभा कि पचीसवी सालगिरह नहीं मनायी थी क्योंकि तब बच्चों की शिक्षा के महत्वपूर्ण साल चल रहे थे।
माँ बापकी शादी की सालगिरह मनाने आये बच्चे अपनी नौकरी पर वापिस चले गए।
अभय, विभा दोनोही घर पर थे।
अभयने कहाँ, चलो विभा सालगिरह की शुटींग देखते है।
दोनों एक साथ बैठ गए।
अभय ने व्हिडिओ शूटिंग शुरू की।
अभय विभाने दुल्हादुल्हन की तरह कपड़े पहने थे।
मानो तीस साल पहलेके शादीके दिनकी फिरसे अनुभूति ले रहे थे।
विभाने तीस साल पहले इस घरकी चौखट लांघकर गृहप्रवेश किया था।
विभाको वही भोली,मासूम विभा याद आयी।
कुछ गलती तो नही होगी इस सोचसे डरनेवाली।
दोनोही शुटींग देख रहे थे।
शुटींग देखते देखते विभाके मनमें कही बेबाक बाते उमड रही थी।
अब उसका मन शुटींग देखनेमें नही लग रहा था।
अभयने पूछा ,
क्यों विभा,क्या हूआ? क्या सोच रही हो?
सोच रही हूँ क्या हम सचमुच वैसेही है जैसे परसो बाते कर रहे थे?
मतलब?
अभय मै कुछ कहूँ?
बोलो ना विभा।
अपनी शादी की सालगिरह पर करीबी लोगोने बधाईयाँ दी।
जोड़ी कितनी आदर्श है।
एक दूजे के लिये बने।
Made for each other वगैरा।
सभी का यही कहना था कि हम कितने आदर्श हैं
एक-दूसरे को कितना समझते हैं … आदि।
फिर तुम्हारी बारी आयी मेरे बारे में,अपनी शादी के बारे में कुछ कहने की।
तुमने मेरे तारीफोकें पुल बाँधे।
शादी के बाद से मैं तुम्हें कैसे साथ दे रही हूँ,
मैंने घरका, बच्चोका, तुम्हारा , सबका कितना अच्छा ख्याल रखा,शादी की शुरुआत में, मैंने कम पैसे में घर कैसे चलाया ?
आदि आदि ….
फिर आयी मेरी बारी।
जैसे ही मेरी बारी आयी, तुम्हारे चेहरेपर डर साफ-साफ दिखाई देने लगा।
तुम्हें पता है मुझे सच कहने की आदत है ।
कही मै सब सच कह ना दूँ ये तुम्हारा डर कभी मैने सच नही होने दिया।
तुम्हारे लिए हमेशा मै झूठ बोलती रही ।
इतने साल सँभाली हूई तुम्हारी प्रतिमा भला मै कैसे धूमिल करती?
फिर मै भी झूठ पें झूठ बोलती गयी।
अच्छी तरह से शिक्षित होने के बावजूद, मेरे घर पर रहने का फैसला अकेली का था इस झूठसे शुरु हूई।
मै यह बात नही बता पायी कि तुम्हें एक ऐसी पत्नी चाहिए थी जो घर की देखभाल करे और पती घर आने पर वे उसके हाथमें चाय की प्याली थमा दे।
तुमने हमेशा मेरे अंदर के कलागुणोकों प्रोत्साहित किया ये भी एक झूठ ही था।
हमने बच्चों को एक साथ पाला,संस्कारित किया यह भी एक झूठ ।
मुझे अभी भी याद आती हूँ तुम्हारे और बच्चोके बीच फँसी हूई मै।
बच्चोको कुछ लेना है तुम्हें समझाओ।
उनको किधर जाना है तुम्हें मना लो।
अगर उन्हें कभी कम मार्क्स आये तो उसकी जिम्मेदारी मुझपर आ जाती थी।
कही बार मुझे सुनना पडा कि, मेरे लाडप्यारसे बच्चे बिगड गये।
अकेले बच्चों की देखभाल करते करते थक जाती थी मै
लेकिन मुझमें इतना धैर्य नही था कि मैं कँह सकू।
तुमने उतना धैर्य मेरे पास आनेही नही दिया।
अपनी जीवनमें जो तूफान आये थे जो केवल मै और तुम जानते हैं अभय।
वो भी मै किसीको बता नही पायी।
तूफान आये और चले गये लेकिन मैंने अपने आशियानेकों बिखरने नही दिया।
इसलिए सबको तूफान नही उसके बाद आनेवाली शांति दिखी ।
मैं एक गृहिणी ..गृहको सँभालनेवाली, सँवारनेवाली, सजानेवाली,बस् उससे ज्यादा कुछ नही।
तुम मुझसे बेहतर हो यह जताने की तुम्हारी जिद हमेशा महसूस करती रही ।
फिर भी घरमें शांति रहे,तुम्हारी प्रतिमा साफ रहे और अपना घरौंदा ना टूटे इसलिए खुदको मिटाती गयी अंदरही अंदर।
घरमें तूम अकेले कमानेवाले हो ये जतानेका मौका तुमने कभी छोडा नही। मुझे भी आदत हो गयी।
तूम पैसे तो मेरे हाथमें थमा देते थे लेकिन वो खर्च करनेकी छूट मुझे कभी नही मिली।
खुदके लिए पैसा खर्च करते हुए, मैं कभी नहीं भूल पाती थी कि यह तुम्हारी कमाई है। तुमने भूलने ही नही दिया मुझे।
सभी इच्छाएँ अंदर ही अंदर मरती गयी।
तुम्हें जिस सामान कि जरुरत जब लगे तब वही सामान घरमें आया।
तुम मेरी कितनी परवाह करते हो, तुमने मेरी सभी इच्छाओं को कैसे पूरा किया …
ये झूठ सूना और मुझे याद आया कि मैं कितनी बार अकेले ही अस्पताल गयी हूँ।
केवल तुम्हें पसंद नहीं , इसलिए मैंने हर शौक को मनके अंदरही रखा।
याद करने की इतनी कोशिश करने के बावजूद, एक भी ऐसी इच्छा याद नही आ रही जो पूरी हुई।
कल बच्चों द्वारा मनाए गए समारोह में मेरी आँखोंसे आँसू गिर पडे। सृष्टी, बडी बेटीने पूछा ।
“मम्मी आपकी आँख क्यों भरीं?”
मै कुछ बोलती इसके पहलेही तुमने कँहा,
मम्मी के यह खुशी के आँसू हैं।
शादी के तीस साल बाद भी
तुम मुझे क्या बोलना है यह तय करते हो।
खैर जाने दो
आजतक दुनियासे जो बाते छूपायी थी वो वैसेही रहेगी मेरे मनके अंदर मुझे कचोटती हूई।
मैंने सच बताने का फैसला किया था।
लेकीन नही बता पायी।
किसने रोका मुझे?
तुम्हारा डर या तुम्हारी प्रतिमा?
नही।
अभय तुम्हारा प्यार बीचमें आ गया।
अभयने बीचमें टोका।
मतलब आज तक मै भ्रममें था।
अभयने बीचमें टोका।
मुझे हम दोनो अलग अलग है ऐसा कभी लगा ही नही विभा।
तुम तो मुझे मेरे एक नजरसे पहचानती हो विभा।
मेरे एक शब्दसें मेरे मनमें क्या चल रहा जान लेती हो तूम।
फिर ये क्या है विभा?
हम दोनोमें इतना अंतर कैसे?
तुम्हारा मन मै बिना बोले पहचान सकती हूँ।
ये सच ही है अभय।
तुम्हें क्या पसंद आयेगा?
किस बातपें तुम गुस्सा होंगे?
ये सब बिना कहे मै जान जाती हूँ।
लेकिन तुम्हारा वैसा नही अभय
मेरे मन तक तूम कभी नही पहूँच पाये।
मेरे मन में झाँकनेकी कोशिशही नही की तुमने।
काश। तुम समझ पाते।

लाजवाब