सुरोकी बारिश

कोरटकर सुप्रसिद्ध संगीत घराना
संगीत की बात छेड़ी जाए और सारंग कोरटकर का नाम ना निकले ऐसा होना नामुमकिन है।
संगीत कि विरासत साथमें लेकेही दुनियामें आया।उसके लिए खुद को नसीब वाला समझने वाला सारंग आज अपाहिज बना हुआ है ।
उसके साथी तबला, हारमोनियम,सतार उसकी तरफ हताशा से देख रहे हैं । वो भी सारंग के साथ गुँगे हूए है।
यह तबला इसपर कभी कहरवा कभी तीनताल तो कभी रूपक बजता था।
ठेका और लय इसमें कभी भी ना चुँका ।
और यह हारमोनियम काली चार लगाए की सफेद एक हमेशा खुशी से इस ने साथ दिया ।
सतार सारंग का विक प्वाइंट।
वह सीखने के लिए उसको बहुत मेहनत करनी पडी। सीखते समय उंगलियों से खून निकलता था ।
लेकिन सीखने की जीत बरकरार रही ।
धीरे धीरे उंगलियों को आदत हो गई और वह सतार पर आराम से घूमने लगी।
मल्हार और मीरा का सारंग एकलौता बच्चा ।
मल्हार भी गायन और वादन में कुशल थे।और उसमें उनको मीरा का साथ मिला ।
गाने के महफिल में दोनों मिले ।
प्यार हुआ शादी हुई दोनों के संसार में किल किलारी गूंजी सारंग नाम की।

सारंग जन्मके साथही सुर,लय,ताल और मधुर गला साथ लाया था ।
मल्हार और मीरा जैसे माता पिता होनेपर संगीतका हुनर उसमें आना ही था।
मल्हार की तबला , हारमोनियम और गाने पर हुकूमत थी।
लेकिन महफिल सजाने से अच्छा अपना गुण बच्चों में बांटना उन्हें अधिक खुशी देता था।

इसलिए उन्होंने सारंग तीन साल का होने के बाद संगीत क्लासेस शुरू की।
क्लास में छोटा सारंगभी आकर बैठने लगा ।

सारंग गाना सीखने लगा ।
धीरे धीरे तबले पर भी उसकी थाप पड़ने लगी ।
मल्हार मीरा उसको कुछ अलग नहीं सिखाते थे।
जो क्लास में पढ़ाते थे उतनाही ।
लेकिन उसके खून में ही संगीत था।
कुछ दिनोमें सारंग ने हारमोनियम बजाना शुरू किया।
कुछ सालों में ही तबला और हारमोनियम वह सफाईसे बजाने लगा।
हारमोनियम पर हाथ रखा तो उससे मधुर सुर बाहर निकलते ही थे वही उसके गले का भी हाल था ।
शुद्ध, कोमल,तीव्र,मध्यम सभी स्वर जैसे चाहिए वैसे गले से बाहर पढ़ते थे। जैसे पूरा संगीत उसके पकडमें था।
सारंग विलक्षण प्रतिभा का धनी था।
मीरा और मल्हार उसपें बहुत गर्व महसूस करते थे।
छोटा सारंग मां बाप के सुरेल गीत, भीमसेन जोशी के और कुमार गंधर्व के गीत सुनकर बड़ा हो रहा था ।
मल्हार को तबला , हारमोनियम और गानेपर हुकूमत थी।
लेकिन सारंग उनसेभी दो कदम आगे था।
सारंगने दूसरी जगह जाकर गिटार और सितार सीखना शुरू किया । साथ में स्कूल की पढ़ाई भी चल रही थी।
लेकिन उसको पढाई ज्यादा पसंद नहीं थी ।
उसकी चाहत,उसका प्रेम एकमात्र संगीतही था।
एक बार ताल और सुरकी दुनिया में गया तो वह वही गुम जाता था ।
आजुबाजू क्या चल रहा उसे कुछ नहीं दिखाई देता था।

दिन गुजर रहे थे ।
मल्हार और मीरा संगीत की क्लास काफी बढ गयी थी।
इतने विद्यार्थियों को सुरोका ग्यान बाँटना मुश्किल हो रहा था।

सारंग अब बड़ा हो गया ।
संगीत की दुनियामें उसको जो जो पसंद था वो सब उसने सीख लिया। उसमें कुशल हो गया ।
उसको अब स्टेज शोके लिए लोग बुलावा आने लगा।

लेकिन उसने बचपनसे सुरोकी देन लोगोमें बाँटते माता-पिता को देखा था।
उसको भी वही करने की चाहत थी।
जो उसने माता-पितासे,गुरुसे सिखा था वो सब दुसरोकों देना चाहता था।
सुरो की जादू बिखेरना चाहता था।
सारंग को गाना और सितार विशेष पसंद थे। वह जबभी सितार बजाता था सुननेवाला चकीत हो जाता था।
उसनेभी बच्चोको संगीत पढाना शुरु किया।
जल्दी ही सारंग बच्चों का पसंदीदा टीचर बन गया
उसका सिखाने का तरीका सबको भाता था।
बहुत अलग अंदाज था।
उसका सिखानेमें मधुरता थी ।
जैसे जैसे बीतते गये बच्चों की संख्या बढ़ गयी।
अब मल्हार और मीराने बच्चोकों पढाना बंद किया।
सारंगकी शादी मेधासे हो गयी।
उसको गाना गाना नही आता था लेकिन गाना समझती थी।
सारंग के सुर उसके ह्रदय के अंदर तक पहुंचते थे ।
सारंग और मेधा के जीवन में छोटी परी रानी आई आसावरी ।

आसावरी मेधा जैसी थी उसको गाना कम गणित ज्यादा पसंद था ।
दादा दादी ने उसकी सुरोके के साथ पहचान करने की बहुत कोशिश की लेकिन व्यर्थ ।
आसावरी बड़ी हो रही थी सारंग बहुत लोकप्रिय शिक्षक हो गया थे मल्हार और मीरा वृद्ध हो गए थे ।
दोनो एक-एक करके चल बसे ।
सारंग के तो जैसे सुरही गुम हो गए ।
कुछ दिनो बाद मेधा और सारंग के शिष्य उसे फिर से संगीत की जादुई नगरी में वापिस ले आये।
सारंग के पास सिखने के लिए एक बाईस साल की लड़की आती थी – विभावरी।
उसकी भी सुरों के साथ दोस्ती थी । अच्छा गाती थी।
धीरे धीरे उसको सारंग से प्यार हो गया । सारंगभी उसकी तरफ आकर्षित हो गया ।
लेकिन वह मेधा के साथ बेवफाई नहीं कर पाया ।
विभावरी क्लास छोड़ कर चली गई । आसावरी बड़ी हो रही थी पढ़ाई में होशियार तो थी ही ।
पढ़ाई उसने पूरी की । दूसरे शहर में जॉब मिला ।
वहीं पर उसके जीवन में भार्गव आया ।
आसावरी पर सारंग और मेधाको पूरा भरोसा था इसलिए ना बोलने का सवाल ही नहीं था ।
आसावरी का अलग से संसार बस गया ।
अब घर में सारंग और मेधा दोनों ही थे ।
सारंग दिन भर बच्चों को पढ़ाने में बिझी में रहता था संगीत उसका श्वास था।
आसावरी और भार्गव बीच-बीच में मिलने आते थे ।

भार्गव को सुरो की समझ थी।
वह आने के बाद दिन भर सारंग के क्लास में बैठता था । यमन ,भैरवी , मालकंस, जो जो राग और बंदिशे सारंगको पसंद थे वो सब वह गाता था।
बिहाग राग का ख्याल उसे विशेष पसंद था ।

देखो सखी कन्हैया रोके।

आसावरी और भार्गव के दुनिया में एक नन्ही परी आ गई सारंग नाना बन गए ।
भार्गव ने बच्ची का नाम रखने का अधिकार उसके नाना को दिया ।
सारंग ने उसका नाम भैरवी रखा ।
भैरवीमें नाना का संगीत का गुन आया।
वह जब भी आती थी
नाना मुझे गाना सिखाइए ना
ऐसी जिद करती थी ।

सारंगभी उसे सिखाता था
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए।
और दोनों मेधाको देखाकर हँसते थे।
वह भी दोनोकी हँसीमें शामिल होती थी।

भैरवी आते ही घर हँसीमें डूब जाता था।
एक बार घर में सारंग और मेधा दोनों ही थे।
मेधा को हार्टअटैक आया । अस्पताल में पहुंचने से पहले ही मेधा ने दम तोड़ दिया ।
जिसके लिए जीवन में आए हर मोहपर सारंग ने विजय प्राप्त की थी वही आज उसको अकेला छोड़ कर चली गई थी ।
आसावरी, भार्गव और भैरवी कुछ दिन रुके लेकिन उनको भी अपने अपने काम थे।
अब क्लास खत्म होने के बाद सारंग घर में अकेला ही रहता था ।

जीवन में ऐसा समय पहली बार आया ।
इसके पहले अकेले रहने की नौबत कभी नहीं आई थी।
क्लास खत्म होने के बाद मेधा बिना वो घर उसे मेधाकी याद दिलाता था।
घरमें चारोओर मेधाकी यादें बिखरी थी।

ऐसे में उसको पैरालिसिस का अटैक आया और उसके शरीर का एक हिस्सा कमजोर हो गया।एकदिन में जैसे उसका बिताया हूआ जीवन सपना बन गया।
उसका संगीत अतीत बन गया।

आसावरी तुरंत आ गई ।
लेकिन सारंग अब चल नहीं सकता था, बोल नहीं सकता था क्लासेस उसको बंद करने पड़े ।

अब तबला ,सितार,हारमोनियम बेजान हो गये।
उनको बजानेवाला कोई नही था।

गलेके सुर उसको छोडकर चले गये।
सुर उसका जीवन थे संगीत उसकी साधना ।
सुर,संगीतके बिना उसको उसका जीवन अर्थहीन लगने लगा।

आसावरी, भार्गव ने उसको अपने साथ रहने का आग्रह किया लेकिन सारंग माता, पिता, मेधा, उनके संगीत की यादों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था ।
वे दोनों हमेशा सारंग से मिलने आते थे। भैरवी अपनी पढ़ाई की वजह से नहीं आ सकती थी।
आसावरी ने सारंग के लिए एक लड़का रखा जो पूरे दिन सारंगकी देखभाल कर सके।

सारंगका सारा दिन खिड़की पास रखे पलंगपर लेटकर बितने लगा। खिडकी पास थी लेकिन बाहरका दृश्य काफी दूर था उससे। क्योंकि वो खिड़कीसे बाहर झाँक भी नही सकता था।

मैं फिर कभी नहीं गा पाऊँगा … यह विचार उसे मृत्यु से भी अधिक भयानक लग रहा था। लेकिन सच्चाई वही थी।

सारंग शरीरसे ज्यादा मनसे हारा था।
डॉक्टर ने भी यही बात कही।
सारंगके मनमें जीनेकी चाह निर्माण करना जरुरी था और वह काम केवल सुर कर सकते थे।
उनके बिना उसका जीना जीना नही था।

आसावरी अपने पिता की हालत देखकर दुखी हो जाती थी।
अगर मैने सुरोकों अपनाया होता तो ….. पापा की हालत कुछ और होती …
यह विचार उसके मनमें आता था और वह और भी बेचैन हो जाती थी।

मैं नहीं जी सकता सुरोकें बिना। मेरे सुर मेरे प्राण है।
मेरी धडकन है।
यही सोचते हुए सारंग की आँखों से आँसू बह रहे थे।
तभी दरवाजे की घंटी बजी … उसकी देखभाल के लिए जो
लड़का था उसने दरवाजा खोला।
सारंग ने मुडकर देखा और आसावरी को सामने खड़ा पाया। उसके साथ भार्गव और भैरवी भी थे।
भैरवी हार्मोनियम के पास गई। सुर छेडे और मालकंस शुरू किया …
आरोह,अवरोह,स्थायी,अंतरा…भैरवी आगे आगे बढती रही

सारंग की आंखों में आंसू छलक आए। लेकिन आँसुओं के साथ एक चमक भी थी।
सारंग ने इशारोसेंही पूछा
तुमने कहाँ से सीखा?
आसावरी ने बैग से सारंग के टेप निकाले।
पापा,भैरवी ने इन टेपों को सुनकर सीखा।
भैरवी अपने नाना के पास जाकर उनसे लिपटी ।
आसावरी और भैरवी कुछ दिनों के लिए सारंग के पास रहीं।

भैरवी प्रतिदिन हार्मोनियम निकालती थी ।।
भूपाली, यमन, भीमपलासी, मालकंस …. बजाती थी।

इतन जोबन पर…
लखछबी सावरीयाकी
बंदिशी गाके सारंगको सुनाने लगी।

सारंग की सेहत में सुधार हो रहा था।
सुरोने चमत्कार दिखाया था।
उसके अंगों में ताकत आ गई।
धीरे-धीरे भैरवी की मदद से उन्होंने हार्मोनियम और तबला बजाना शुरू किया।

लेकिन सुर अभी भी सारंगसे दूरही थे।

वो काम फिर भैरवी कर देती।
सारंग हार्मोनियमपर पर उनका साथ देता थाऔर भैरवी सुर छेडती थी।

सारंग ने हारमोनियम और तबलाके क्लासेस फिर से शुरू किये।

सारंग का घर फिर से सुरोसे सज गया। उसके आँगनमें फिर एकबार सुरोकी बारिश बरसी।

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