……..जाने क्यूं ….आज दिल बडा उदास है……युं तो कुछ महसुस नही….मगर बैचैनी कुछ खास है…..
…..शायद …समय का फर्क है…..भरी दोपहरी….और अलसायी सी धूप….नियती भी अपनेआप मे गुमसुम और चुप.. चुप….मन भी मैला सा…उदासीयों के आसपास है…..
…….जाने क्यूं आज दिल बडा उदास है…
……दूर वो जो अकेला सा दरख्त खडा है…..
…..उम्र मे काफी बडा है…..खुशीयो के सारे रंग देखें और बांटे है उसने…..लेकिन आज उसकी हरियाली मे भी…घुटन भरी आवाज है……हवाओं मे उसके भी दर्द भरा साज है…..
…..जाने क्यूं आज दिल बडा उदास है…..
…….अरे यह क्या…..गिलहरी…वही गिलहरी….जो कल जख्मी थी उदास थी शांत .और अकेली थी…….और आज….आज सरसरा रही है…… चहचहा रही है….कहां …कहां….
वो वहां…वहां ……उस दरख्त पर….और ऊपर ..डालडाल पर….सरसर नीचे ..सरसर ऊपर……..
……ओह…… कुछ खा रही है ….इतनी तेजी …इतनी चपलता ….कल और आज मे इतना फर्क.इतना बदलाव…..ओह कितनी चंचल है ये.कितनी प्यारी….कितनी मासूम…..शायद दर्द को समेटना और सहेजना जानती है ……. तभी तो …..
….मेरी खिडकी से वही समय ..वही असिमित आसमां वही दरख्त ….. वही धूप ….. वही….सब कुछ…..कल का मंजर .
फिर….फिर….. मुझे क्यू अनमना सा लगा…..क्या गिलहरी की तरह मेरा मन भी आज घायल है,,जख्मी है…..क्या मुझमे कुछ ऐसा नही बेकरारी मे जो मुझे बरकरार रखे….
ओह. है ,,,है,,ईस नन्ही गिलहरी को देखोें……आज मैने इस नन्हीं गिलहरी से कुछ सीखना. औ समझना है…..समय प्रवाह संग बहना और बढते जाना है ……
…..असिमित आसमां मे तैरते असंख्य बादलों मे अपने हिस्से के बादल को संजोना और सवांरनां है….. …..खिडकी से दिखता..मेरे हिस्से का बादल मेरा गीत है तराना है ..मेरा अफसाना है ..उसे अपना बनाना है आँचल मे छुपाना है…………..इस नन्ही सी गिलहरी ने क्या गजब है ढाया, विस्तृत आसमान मे मेरे हिस्से का बादल दिखाया….
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खुबसुरत