उम्र का फलसफा
उम्र का फलसफा

उम्र का फलसफा

 

मैने खुद हि खुद को ढूँढा   हैे
अपने आप मे पाया है
आत्म विश्वास और संबल
हि तो मेरी छाया है
न मै कोमल न सुंदर
न ,नाजुक न विदुषी हि सही
मगर हां खुदगर्ज बिल्कुलनही
परवाह परस्त हूं
अपने आप मे मस्त हूं
खुद पे ही नाज़, है
सम सामयिक मेरी आवाज है
जीवन का चढता पडाव
बडी नेमतो से कर्तव्यों संग पूरा हुआ
ढलान मे फिसलन न हो बस यही दुआ
अब बस बे परवाह होना है
दिल मे दबा के रखी हर चाह को जीना है
बच्चे पंछी बन उड़ चले कोटरों से
नई दिशाओं में.. नये आसमां की तलाश मे
हमे भी मौसम बदलने होंगे
इसी जमीं, को हरियाली देनी होगी
और आसमां की ऊंचाईयो
तकआशाओं की उपज लेनी होगी
अब बस खुद को भी सजाना है..
बहुत जी लिया सबके लिये,
अब खुद के लिये जीना है..
ढलतीउम्मीदों को,
फिर से सहेजना है सींचना है..
रुठी हुई ख्वाहिशों को ,
बाहों मे भरकर भींचना है..
जीनाहै जिंदगी को फिर से,
अब नयी उमंग मे..
तमन्नाओं केसंग में..
इस मै के सफर मे अपना
हाथ थामे गुनगुनानाहै
अंजुली मे धर जुगनुओं को
इतराती तितलियो पीछे
भागना हैखिलखिलाना है
बस अब मै इस
नए सफर मे हर पगडंडी को
रौशनी से जगमगाऊँगी
लिखूंगी फिर से जिंदगी के सफहे
बदल दुंगी बढती उम्र के फलसफे.
मैं अब खुद ही, अपना नसीब हूँ..
और अब जाके अपने आप के करीब हूं…

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