वाह रे गुलाब- हिंदी कविता
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
निगाहों की रजामंदी से … तमन्नाये मचलती है ….. तमन्नयाओं के मचलन से जजबात जवां होते है …. दिल पिघलने लगता है … पिघलता दिल …
हर दौर मे उम्र इक नया तजुर्बा इख्तियार करती है …. कभी आंसुओं के मझधार मे छोड देती है … .तो कभी जिंदगी को गुले …
जबसे हुई है शादी ससुराल बना है मायका सास ससुरजी की छाया मे खयाल रखती हु सबका पाकर सास की ममता माँ को भी …
चलो मिलजुल कर चिराग जलायें हर दिलमें रोशनी फैलायें जात-धर्म कें नाम पर लड पडनेंकी आदत छुडवायें दानधर्म के झोली भरते हैंं भुखकें मारे …
.. तोड़कर सारे बंधन तो एक दिन जाना है तो फिर क्यूं ना जुड़ने के बहाने तलाशे बिखरना ही है हवा के झोके संग एक …
हर सहर उदासी लिये चली आती है पंछियो की चहक भी विरानिया गाती है दिन का हर लम्हा सहमा ला लगता है जर्राजर्रा अकेला सा …
मैने खुद हि खुद को ढूँढा हैे अपने आप मे पाया है आत्म विश्वास और संबल हि तो मेरी छाया है न मै …
ऐ पिया ऐ पिया सुन सुन बतियाँ सब सखिया मिचियां अखियां बीच बजरिया करी ठिठौलियां हाय दैया हाय हाय दैया…… फैली कजरिया बिखरी गजरिया चटखी …
वर्षा की धीमी फुहार से ….. गया है तनमन भीज … बिना संदेशा दिये चल दि …… उष्ण मौसम की खीज …… वर्षा आयी वर्षा …