मन की सजा

डॉक्टर ने मेघा को बेहोशी का इंजेक्शन दिया।
मुझे क्षमा करें …. मेघा फुसफुसाते हुए सो गई।
मेघा के पिता गोविंदजी बाहर तक डॉक्टर को छोडने आए।

उन्होनें चिंतित स्वर में पूछा,

“डॉक्टर, मेघा को क्या हुआ?”

यह कब से हो रहा है?
बस इतनेमे ही हो रहा ।
वह
मुझे क्षमा करो
कहती है और एकटक देखती रहती है।
पूरी रात सो नही पाती।

मैंने उसे दवा दी। देखते है ।अगर वह बेहतर महसूस करती है, तो ठीक है, अन्यथा उसे शहर के किसी अन्य डॉक्टर के पास ले जाना होगा।
इतना कहकर डाँक्टर चले गये।

गोविंदजी और चिंतित हो गए।

गोविंदजी चंदूरा गाँव के एक अमीर व्यापारी थे।
उनकी दो बेटियां और एक बेटा था।
उनकी पत्नी कविता की तीन साल पहले मौत हो गई थी।
और उसके बाद उनकी लाडली बेटी अमोली भी अचानक चल बसी।
गोविंदजीने ईमानदारी से उनके पिताजीने खडा किया हूआ व्यवसाय आगे बढ़ाया था।
उनके पिताजीने अपना सारा जीवन इस व्यवसाय को खडा करनेमें लगाया था।
कविता और अमोली के जाने के बाद गोविंदजी जीवनसे उब गये थे। जीनेकी चाह जैसे खत्मसी हो गयी।
उनका अब किसी चीजमें मन नही लगता था।

मेघा प्रसव के लिए यहाँ आई है। क्या हो रहा उसके साथ? बार बार वह किससे क्षमा माँगती है?
गोविंदजीका तनाव बढ रहा था।
उनके दामाद आलोक कंप्यूटर इंजीनियर थे। कंपनीने उन्हें छह महीने के लिए विदेश भेजा था।

मेघा का अभी पांचवा महीना था।

पापा सोए नहीं?
उनकी बहू ने पूछा।
पापा थोड़ी देर के लिए सो जाईये आप।
मैं मेघाके के पास रुकती हूं।

ठीक है बेटा।
यह कहते हुए गोविंदराव सोने चले गए।

आस्था गोविंदजी के बेटे जय कि धर्मपत्नी का नाम था।जब से आस्था शादी करके आई उसने घरको बहूत अच्छेसे सँभाला है।
मेघा की शादी के बाद, गोविंदजी अकेलापन महसूस कर रहे थे वो आस्थाके आने के बाद काफी कम हूआ।

सुबह हो गई । इंजेक्शनकी वजहसे मेघा की अच्छी नींद हो गयी। वह प्रसन्न दिख रही थी।
गोविंदजीने पूछा
बेटी कैसे हो?

मुझे अच्छी नींद आई , पापा।
मेघा को रात का कुछ भी याद नहीं था।

गोविंदराव दुकान गए।

थोडी ही देरमें आस्था का फोन आया।
पापा , मेघा की तबीयत बिगड़ गई।
गोविंदराव और जय जल्दी घर आ गये।
वे डॉक्टरों को भी साथ ले आए।

मेघा चूपचाप बैठी एकटक देखे जा रही थी।

आस्थाने बताया,
मै और मेघा किचनमें खाना बना रहे थे।
अचानक मेघा मुझे क्षमा करो कहते हूए किचनके बाहर भागी ।

डॉक्टर ने मेघासे बात करने की कोशिश की,
लेकिन वह कुछ भी कहने को तैयार नहीं थी।
उसे कुछ भी याद नही आ रहा था।

डॉक्टर ने उसे शहर में एक मनोचिकित्सक को देखने के लिए कहा।
अगले दिन जय और आस्था मेघा को शहर ले गए।
वे वहां डॉक्टर से मिला।
मेघा से कुछ भी उगलवाना बहूत मुश्किल था।
वह अपने अतीतमें कि हूई कोई भूल यद करती है और अपराधबोझमें दबा जाती है इतनाही समझमे आ रहा था

क्या याद करती होगी वह?
जय और आस्थाको कुछ पता नहीं था।
गोविंदराव को कुछ भी याद नहीं था।

उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी सीधी, भावुक बेटी कुछ गलत कर सकती है।
जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मेघा की मानसिक हालत बिगड़ती जा रही थी।
अब वह रसोई में पैर रखने से भी डरती थी।

सुबह आस्था गोविंदराव को बता रही थी,

रात में मुझे क्षमा कर देना। मैंने गलती की आलोक कि वजहसे… मेघा बड़बड़ा रही थी
गोविंदराव और जय दोनों हैरान थे।
मेघाके ससुरालमें तो दोनोने मिलकर कुछ गलत नही किया?
लेकिन मेघाके ससुरसे हमेशा बात होती है। वह मेघाकी प्रशंसाही करते है।
फिर क्या बात होगी?
गोविंदजी सोचमें डूब गये।

मेघा डॉक्टरसे इलाज तो करवा रही थी लेकिन तबीयतमें कुछ फर्क नही पड रहा था।

अब तो मेघा यह भी भूल गई थी कि वह अब माँ बनने वाली है।
वह रात में नींदमेही उसके बेडरुमसे बाहर भाग आयी और ऊपर के कमरे से आते हुए सीढ़ियों से नीचे गिर गयी।
बच्चा चल बसा

गोविंदरावने आलोकको फोन करके वापिस बुलाया ।
आलोकको देखतेही देखते ही मेघाने चिल्लाते हूए कहाँ,
आलोक आपही बताइये ना मैने कुछ नही किया।
दी— इतना कहकर मेघा बेहोश हो गयी ।

डॉक्टर ने आलोक से पूछा।
उसने कहा कि ऐसा तो कुछ नहीं हुआ था।
लेकिन अंदर ही अंदर वह हिल गया था।
मेघा फँसेगी .. मुझेभी फसवायेगी ….. सोचकर वह पसीने से भीग गया ।

उसको अमोली,उसकी पहली पत्नी याद आयी।
उसकी शादी अमोलीके साथ हूई थी,लेकिन शादीके दिन के दिन मेघा को देखा और वह उसे पसंद आयी।
मेघा अभी युवावस्था में आई थी। उसे अभी तक अच्छे और बुरे की समझ नहीं थी।
मेघा आलोककी तरफ आकर्षित होने लगी। और नाता भी जीजासाली का था।
दोनो का प्यार परवान चढने लगा। अब दोनोके एक साथ आने के लिए अमोली एकमात्र बाधा थी।

अमोली मायके आई थी। चार पाँच दिनके बाद
आलोक उसे लेने आया ।
रसोई में अमोलीको कुछ चाहिए था। उसने एक स्टूल लिया और उसपें खड़ी होकर, उपरसे कुछ निकालने लगी।
तभी आलोक अंदर आया। उसने स्टूल को धक्का दिया।
मेघा उसके पास खड़ी थी। वह अमोली को बचा सकती थी।
अमोली चल बसी। मेघा और आलोकका ब्याह हो गया ।

मेघाको हमेशा पछतावा होता था लेकिन आलोक को
जराभी पछतावा नही था।

अब क्या होगा?
आलोक सोचकर डर गया।
उसके आँखो से नींद भाग गयी।
रात भर आलोक करवटें बदलता रहा ।

दो दिन में वापस जाने का निर्णय उसने लिया।

अगली सुबह सब लोग नाश्ता कर रहे थे।
आलोक ने कहा कि वह कल वापस जाएगा।

आस्था मेघा का हाथ पकडकर धीरे धीरे नीचे आयी।
मेघा आलोक के पास गयी।
आलोक ,आप सबको बता दो कि मैंने कुछ नहीं किया है। आपने ही अमोली दीदी कि जान ली ।
इतना कहकर वह चुप हो गयी।
गोविंदराव और जय मेघा की बात सुनकर दंग रह गये।
मतलब?
आलोकजी ने मेरे अमोलीकी जान—-

आलोक भागने कि कोशिश कर रहा था।
लेकिन जय ने उसे पकड़ लिया।

मेघा मानसिक अस्पताल गयी और आलोक जेलमें ।

….प्रिती …

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