ये चालिस की उमर-हिंदी कविता
अभी तो थोडी सी फुरसत मीली है जीम्मेदारी की गाडी रूक्सत हूई है उम्मीदों के पतंग को जरा ढील दिया कर बेख्याली से जी ले …
अभी तो थोडी सी फुरसत मीली है जीम्मेदारी की गाडी रूक्सत हूई है उम्मीदों के पतंग को जरा ढील दिया कर बेख्याली से जी ले …