वाह रे गुलाब- हिंदी कविता
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
अभी तो थोडी सी फुरसत मीली है जीम्मेदारी की गाडी रूक्सत हूई है उम्मीदों के पतंग को जरा ढील दिया कर बेख्याली से जी ले …
हर दौर मे उम्र इक नया तजुर्बा इख्तियार करती है …. कभी आंसुओं के मझधार मे छोड देती है … .तो कभी जिंदगी को गुले …
ऐ पिया ऐ पिया सुन सुन बतियाँ सब सखिया मिचियां अखियां बीच बजरिया करी ठिठौलियां हाय दैया हाय हाय दैया…… फैली कजरिया बिखरी गजरिया चटखी …
वर्षा की धीमी फुहार से ….. गया है तनमन भीज … बिना संदेशा दिये चल दि …… उष्ण मौसम की खीज …… वर्षा आयी वर्षा …
दिल ए नादां मे इक कसक थमी है .. जानता है दिल के वो आसपास कहीनही…. रुखसत भी हो किस कदर अहसास तेरी मुहब्बत का… …
ऐ बचपन…तु कहां खो गया.. ये तुझे क्या हो गया…क्या तुझे याद नही वो सुहाने दिन वो युँ हि गईगई सी रातें …. न हसनें …
::::::::::::::::::::::::::आईना::::::::::::: ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: जिम्मेदारियों का बोझ ढोतेढोते ….. तमन्नाओं मे शिथिलता आई है .. ख्वाहिशों पर भी हल्कीहल्की झुर्रिया झिलमिलाई है … उम्मीदें लडखडाई है आईने …
तेरे होठो से छुटी आधीअधुरी सिगरेट का एक कश क्या लगाया हवा मे मचलते धुएँ के हर एक छल्लो मे बस तेरा हि अक्स नजर …
जो आँखो की चमक है न तुम्हारी शरारतो के लिये बेकरार है शायद मिलन को तरसता मनुहार है तस्सवुर मे उतर आया करार है शायद …