वर्णों को शब्दो मे बदल कर जब
भावनाओं के धागो मे पिरोया तो
भावनाओं की श्रंखला
कविता बन गई
जब कभी किसी इठलाती ,,इतराती
बलखाती नवयौवना को निहारा तो उसका
मनोहारी रूपऔर जानलेवा अदाओंपर
कविता बन गई ,
जबकभी आसमान मे घिर आई सावन की
काली घटा बसंती हवाओ संग बरसन परआई
सनम की याद और बेवफाई पर
कविता बन गई
जब कभी प्रगति के नाम पर
वयस्क और हरेभरे व्रुक्षो की कटाई देखी
मानवीय क्रूरताऔर निर्दयता पर
कविता बन गई
जब भी मां को ….ज्यादा न खेल ,, फिर भुक लगी भुक लगी कहेगा.
मासूम बच्चे से कहते सुना ,,तो कसम से
गरीबी और लाचारी पर
कविता बन गई
जबकभी दहेज केअभाव मे पढी लिखी
सुंदर कन्या एक मगरूर संग ब्याहते देखी गई तो कन्यादान और विवाह पर
कविता बन गई
जब कभी पत्नी के चलते इकलौते पुत्र को
लाचारी से बुढे मांबाप को आश्रम भेजते देखा
आज की पीढी पर
कविता बन गई
जब कभीसमाज और संस्क्रती के नाम पर
ढोंग ढकोसले होत्ेदेखे …हर इक ह्रास
,हर इक उपहास पर
कविता बन गई….
सरिता विलास बायस्कर
हो
…सरिता विलास बायस्कर…
कविता
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