संस्कृती धरोहर स्त्री
संस्कृती धरोहर स्त्री

संस्कृती धरोहर स्त्री

किसी दिन फुरसत से
अपनी शख्सियत से मिलो
सारा हुनर सामने आ जायेगा
फिर असर पे गौर करना
छत की सुराख से आती
धुप की किरण …
तुम पर हि सिमट कर
ठहर जायेगी…
क्यो..
क्योकि तुम ईश क्रति
नारी शक्ति हो ….
विधाता की सुंदर
कोमल कलाक्रति हो
तुम सृष्टि हो…सृजन कर्ता हो …
सृष्टि त्राता हो
भाग्यविधाता हो ….
मिटना जानती हो …
मिटाना भी जानती हो …
खिलना जानती हो .
खिलाना भी जानती हो
तुम जीवनडोली की कहार हो
हर संघर्ष का प्रत्यहार हो
हर गुनाह पर प्रहार हो
इस घरणी पर मनोहारी उपहार हो
हे नारी तुम सकुचित कभी न होना …
आंसुओं सेआँचल कभी न भिगोना
तुम से ही है जीवन संस्कृति
तुमही तो हो संस्कार धरोहर
तुम ही आरंभ तुम ही अंत
शाश्वत सत्य मोक्ष पर्यंत
हे नारी तुम्हारा क्या कहना
तुम ही धरा पर अमुल्य गहना…

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