वाह रे गुलाब- हिंदी कविता
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब….. तुम्हारा न कोई तोड ..न हि कोई जवाब वाह रे गुलाब …वाह रे गुलाब ठाठ तो ऐसे ..जैसे सियासती …
निगाहों की रजामंदी से … तमन्नाये मचलती है ….. तमन्नयाओं के मचलन से जजबात जवां होते है …. दिल पिघलने लगता है … पिघलता दिल …
हर दौर मे उम्र इक नया तजुर्बा इख्तियार करती है …. कभी आंसुओं के मझधार मे छोड देती है … .तो कभी जिंदगी को गुले …
अपना अपना कहके सब गले लगा कर बडे इतरा रहे थे गौर से देखा तो पता चला, भरे मैफिल में मौका देख अपनों को …
जबसे हुई है शादी ससुराल बना है मायका सास ससुरजी की छाया मे खयाल रखती हु सबका पाकर सास की ममता माँ को भी …
चलो मिलजुल कर चिराग जलायें हर दिलमें रोशनी फैलायें जात-धर्म कें नाम पर लड पडनेंकी आदत छुडवायें दानधर्म के झोली भरते हैंं भुखकें मारे …
तुम्हारे तस्वीर के सहारे गुजारने लगे दिन रात सारे तुम समझो ना समझो मेरे इश्क़ के वो इशारे अस्मिता मार्डीकर 0
रुखा सा महसूस हो रहा हैँ दिल को ना अभी आँख नम हैँ ना कोई तुमसे शिकायत हैँ ये प्यार भी ना इस मोड पर …
अगर मीठे लब्ज कह दू तो चाहत बढ़ नहीं जाती किसीसे अक्सर देखा हैँ मैंने, मुहब्बत तो वो भी करते हैँ जो इजहार तक नहीं …
मौत सें पहिले भी एक मौत हैं देखो जरा अपनी मोहब्बत सें जुदा होकर कुछ पल के लिये अस्मिता मार्डीकर 0