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हर सहर उदासी लिये
चली आती है
पंछियो की चहक भी
विरानिया गाती है
दिन का हर लम्हा
सहमा ला लगता है
जर्राजर्रा अकेला सा
दिखाई देता है
जाने कैसी आफत आई है
लगता है ये जिंदगी
भी हरजाई है
मगर हां उम्मीद का
दामन न छोडना होगा
माहौल हि तो है
मेहमान है थोडे दिन का
हमेशा थोडे ही रहेगा
कभी तो उस पर जमी
धुल साफ होगी धुंध छटेगी
और फिर और फिर एक बार
मुस्कुरायेगी जमीं
खिल उठेगा आसमां
गुलेगुलजार होगा गुलशन
महकेगा खशीयों का चमन
क्योकि मौसम और खशबु
कभी बदलती नही है..
ईबादत और दुआ
कभी जाया होती नही है
ऐ परबतदिगार ऐ मौला
तेरी रहनुमाई का
हर बंदे को है गरुर
इम्तहां का नतीजा
देर से मगर
सुकुनियत भरा
होगा जरुर… - .@$
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वाह….👌
ताई, छान लिहिले.
वाचायलाही छान वाटते, पण कळत नाही यार