उम्र- हिंदी कविता
उम्र- हिंदी कविता

उम्र- हिंदी कविता

हर दौर मे उम्र
इक नया तजुर्बा
इख्तियार करती है ….
कभी आंसुओं के
 मझधार मे छोड देती है …
.तो कभी जिंदगी को
 गुले गुलजार कर देती है
.मगर हां……………….
गौर तलब तो ये  है के
उम्र तो इंसा के
शरीर की बढती है  …..
रूह की कमसीनीयत
तो ता उम्र बरकरार रहती है…….
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