ऐ बचपन…तु कहां खो गया..
ये तुझे क्या हो गया…क्या तुझे याद नही
वो सुहाने दिन वो युँ हि गईगई सी रातें ….
न हसनें के बहाने न रोने की बातें….
हर हाल मे बस खुश रहा करते थे हम
न कुछ ज्यादा पा लेने की खुशी
न कुछ कीमती खोने का गम….
तंग हो गया दिल इस बदलते मौसम मे
हवाओ सी तेज भागती जिंदगी से….
उकता गई तमन्नाएँ.दफन हो गये अहसासात.
झाडझंखाड की तरह तेजी से बढती ख्वाहिशों.से….
सुकुन सुकुुन करता बढता जा रहा इंसां…
चढता सीढी एक एक नई नई लिए मंशा
मुड के देखने का समय नही…..
मिथ्था है क्षणैक है. सब सोचने का समय नहि.
प्रश्नवत स्थिती हो गई..क्या ऐसा ही चलेगा…
आता हुआ समय अंधाधुंधी मे ही ढलेगा…..
नहिनही….मै तुझे ढूंढूगा….
इस व्यस्त दिनचर्या के चलते
वक्त के किसी इक पल मे
तुझे याद कर संग तेरे जीकर
मै तुझसे रिश्ता जरुर निभाउंगा….
और तेरी पवित्रता को अपनाकर…..
इस जिंदगी को स्वर्णिम बनाउंगा…
ऐ मेरे प्यारे बचपन…..वादा है मेरा
मै जरूर निभाउंगा हर हाला मे साथ तेरा
तेरी मासुमियत को दिल मे समेटकर
जीवन बगिया मे फिर हरियाली लाऊँगा
और निरस हुए खोखले वजुद को फिर सजाऊँगा@$
बचपन
0
