मेरी कविता महफिल शब्दोंकी Chanda शब्दोंकें इस भरी महफिल में ईनसें दिलकी बातें कर लेतें हैं हंस खेलकर इनकें साथ कुछ वादें कर लेते हैं सुबहसे शाम तक मेरा साया होते हैं मुझे गले लगाकर मेरे साथ रहतें हैं गजब है हमारे दोस्तीकें मायनें स्याही बनकर कागजपर उतर आते हैं शीला रंगारी Views: 34 0