कविता
कविता

आईना

::::::::::::::::::::::::::आईना::::::::::::: ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: जिम्मेदारियों का बोझ ढोतेढोते ….. तमन्नाओं मे शिथिलता आई है .. ख्वाहिशों पर भी हल्कीहल्की झुर्रिया झिलमिलाई है … उम्मीदें लडखडाई है आईने …

अक्स

तेरे होठो से छुटी आधीअधुरी सिगरेट का एक कश क्या लगाया हवा मे मचलते धुएँ के हर एक छल्लो मे बस तेरा हि अक्स नजर …

शायद

जो आँखो की चमक है न तुम्हारी शरारतो के लिये बेकरार है शायद मिलन को तरसता मनुहार है तस्सवुर मे उतर आया करार है शायद …

संस्कृती धरोहर स्त्री

किसी दिन फुरसत से अपनी शख्सियत से मिलो सारा हुनर सामने आ जायेगा फिर असर पे गौर करना छत की सुराख से आती धुप की …

अधूरी जिंदगी

किश्तो मे जीतेजीते …. उकता गया ये दिल…… ऐ जिंदगी तु कभी फुरसत से आ के हमसे मिल कुछ तो मुकम्मल हो दिल मे दबी …

चाँद

आशिकाना रात मे पुनम का चाँद भी बादलो की ओट से मौसम का जायका लेता नजर आया …. ,,तु ,,क्या आया जिंदगी मे जीने का …

कान्हा ओ…..कान्हा

.अरे ओ कान्हा….. सच्ची सच्ची इक बात बताओ यूं झूठी बतियां ना बनाओ झुठला कर मेरी बातों को मेरे मन को यूं न बहलाओ…. .क्या …

ये कहां आ गयें हम…!!

हो अब कहां होती हैं मैफिल दोस्तों कीं चौराहें पर, हर कोई अकेले में अपनें अपनें गम कें साथ गुमसूम सां हैं…. कौन कहता हैं …

हमकदम

जिंदगी की धूप छांव……. कभी डालडाल ,कभी पात. पात… कभी मौनमौन , कभी बातबात….. कभी पगडंडी सुंदरमनभावन ….. कभी पथरीला कांटों का बन…. हर पल …

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