कविता
कविता

महफिल शब्दोंकी

शब्दोंकें इस भरी महफिल में ईनसें दिलकी बातें कर लेतें हैं हंस खेलकर इनकें साथ कुछ वादें कर लेते हैं सुबहसे शाम तक मेरा साया …

बचपन

ऐ बचपन…तु कहां खो गया.. ये तुझे क्या हो गया…क्या तुझे याद नही वो सुहाने दिन वो युँ हि गईगई सी रातें …. न हसनें …

आईना

::::::::::::::::::::::::::आईना::::::::::::: ::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::::: जिम्मेदारियों का बोझ ढोतेढोते ….. तमन्नाओं मे शिथिलता आई है .. ख्वाहिशों पर भी हल्कीहल्की झुर्रिया झिलमिलाई है … उम्मीदें लडखडाई है आईने …

अक्स

तेरे होठो से छुटी आधीअधुरी सिगरेट का एक कश क्या लगाया हवा मे मचलते धुएँ के हर एक छल्लो मे बस तेरा हि अक्स नजर …

संस्कृती धरोहर स्त्री

किसी दिन फुरसत से अपनी शख्सियत से मिलो सारा हुनर सामने आ जायेगा फिर असर पे गौर करना छत की सुराख से आती धुप की …

अधूरी जिंदगी

किश्तो मे जीतेजीते …. उकता गया ये दिल…… ऐ जिंदगी तु कभी फुरसत से आ के हमसे मिल कुछ तो मुकम्मल हो दिल मे दबी …

चाँद

आशिकाना रात मे पुनम का चाँद भी बादलो की ओट से मौसम का जायका लेता नजर आया …. ,,तु ,,क्या आया जिंदगी मे जीने का …

कान्हा ओ…..कान्हा

.अरे ओ कान्हा….. सच्ची सच्ची इक बात बताओ यूं झूठी बतियां ना बनाओ झुठला कर मेरी बातों को मेरे मन को यूं न बहलाओ…. .क्या …

तू नही साथ मेरे

तू नही साथ मेरे तो तेरे यादोसे ही बसेरा बना लिया मैने तेरे चूडियोकी खनक से झरोका बना लिया तेरी पायल कि छनछनसे मेरा आँगन …

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